जम्मू के सतवारी इलाके में हुए एक कथित एनकाउंटर में 21 साल के मोहम्मद परवेज़ की गोली लगने से मौत हो गई। इस घटना के बाद उनके परिवार और कई आदिवासी संगठनों ने ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन किया और इसे एक ‘फर्ज़ी मुठभेड़’ करार दिया।परवेज़, जो जावेद नगर, निक्की तवी का रहने वाला था, को गोली लगने के बाद सरकारी मेडिकल कॉलेज, जम्मू ले जाया गया जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। अस्पताल के बाहर बड़ी संख्या में परिजन और समुदाय के लोग इकट्ठा हुए और निष्पक्ष जांच की मांग की।
पुलिस ने सीधा फायर किया
जाने-माने आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता तालीब हुसैन ने कहा, यह एनकाउंटर फर्ज़ी है। परवेज़ पर एक भी एफआईआर नहीं थी। अगर पुलिस को शक था तो उसे कानूनी तरीके से गिरफ्तार किया जाना चाहिए था। उन्होंने आरोप लगाया कि परवेज़ और उसके साले को चेकपोस्ट पर रोका गया और बिना वजह गोलियां चलाई गईं। तालीब ने पुलिस के उस बयान को भी खारिज किया जिसमें परवेज़ को ड्रग्स तस्करी से जोड़ने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा, “कई महीनों से गोजर समुदाय को कभी पशु तस्करी तो कभी ड्रग्स के नाम पर निशाना बनाया जा रहा है। हमने अब तक चुप्पी साधी थी, लेकिन अब ये बर्दाश्त नहीं होगा।” परवेज़ के परिवार ने बताया कि वह तवी नदी के पास रेत खनन का काम करता था और उसका किसी आपराधिक गतिविधि से कोई संबंध नहीं था।
पुलिस का बयान: ऑपरेशन क्लीन-अप के दौरान मुठभेड़
एसपी सिटी साउथ अजय शर्मा के मुताबिक यह मुठभेड़ फल्लैन मंडल इलाके में एक संदिग्ध ड्रग डेन पर छापेमारी के दौरान हुई। यह कार्रवाई “ऑपरेशन क्लीन-अप” के तहत की गई थी, जो नशा तस्करों, गैंगस्टरों और जबरन वसूली करने वालों के खिलाफ चलाया जा रहा है।शर्मा ने कहा, “पुलिस टीम पर संदिग्ध ड्रग पेडलर्स ने फायरिंग की, और जवाबी कार्रवाई में एक व्यक्ति घायल हो गया जो बाद में दम तोड़ गया।” हालांकि, पुलिस ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि मौके से कोई हथियार या मादक पदार्थ बरामद हुआ या नहीं।
स्वतंत्र जांच की मांग तेज
सरकारी अधिकारियों ने कहा है कि इस घटना की जांच शुरू कर दी गई है ताकि इसकी पूरी सच्चाई सामने आ सके। लेकिन परवेज़ के परिवार और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि पुलिस जवाबदेही से बचने के लिए “फर्ज़ी मुठभेड़ों” का सहारा ले रही है।वे एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं ताकि परवेज़ की मौत की असली वजह सामने आ सके और अगर कोई दोषी है तो उसे सज़ा मिले। यह मामला जम्मू-कश्मीर में पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता और आदिवासी समुदाय के अधिकारों को लेकर एक बार फिर बहस के केंद्र में आ गया है।