उत्तर प्रदेश में बिना मान्यता वाले मदरसों को सील करने के योगी सरकार के आदेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है। इस फैसले का जमीयत उलमा-ए-हिंद ने स्वागत किया है और इसे संविधानिक अधिकारों और अल्पसंख्यक शिक्षा की बड़ी जीत बताया है।
जमीयत के कानूनी सलाहकार मौलाना क़ाब राशिदी ने IANS से बात करते हुए कहा कि हाल के वर्षों में खासतौर पर उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में मदरसों को बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के बंद कराया गया। उन्होंने बताया, “असल में सिर्फ 10 प्रतिशत मदरसों को ही कोई आधिकारिक नोटिस मिला था, बाकी को सिर्फ मौखिक आदेशों के आधार पर बंद करने को कहा गया।”
राशिदी ने बताया कि जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी की अगुवाई में ऐसे मदरसों को मुफ्त कानूनी मदद देने की घोषणा पहले ही की जा चुकी थी। उन्होंने कहा, “आज कोर्ट ने सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया कि सिर्फ मान्यता न होना किसी मदरसे को सील करने का आधार बन सकता है। ये फैसला वक्त रहते आया है और बेहद जरूरी था।”
उन्होंने याद दिलाया कि इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर दखल देते हुए एक बड़ा फैसला दिया था। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) द्वारा भेजे गए नोटिसों पर 21 अक्टूबर 2024 को चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने रोक लगा दी थी।
राशिदी ने कहा, “इस केस में जमीयत के मौलाना अरशद मदनी सुप्रीम कोर्ट गए थे और अभी तक उस पर रोक जारी है। खुद यूपी सरकार ने भी अपने अधिकारियों को कहा था कि जब तक सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है, तब तक किसी भी मदरसे पर कोई कार्रवाई न की जाए।”हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ तौर पर सुप्रीम कोर्ट की रोक और राज्य सरकार की एडवाइजरी का हवाला दिया है। अदालत ने माना कि सिर्फ मान्यता की कमी के आधार पर किसी मदरसे को बंद करना संविधान के खिलाफ है।
जमीयत ने इस फैसले को न्याय और संविधानिक अधिकारों की जीत बताया है। मौलाना क़ाब राशिदी ने कहा, “इस फैसले से अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों को मजबूती मिली है। यह फैसला न्यायपालिका पर भरोसा बढ़ाता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए शैक्षणिक आज़ादी को सुरक्षित करता है।”