उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर ज़िले में एक नामी इंटर कॉलेज के मैनेजर मौलाना शब्बीर अहमद की गिरफ़्तारी ने पूरे राज्य में सवाल खड़े कर दिए हैं।ये मामला सिर्फ एक व्यक्ति की गिरफ्तारी का नहीं है, बल्कि प्रशासन की निष्पक्षता, सामाजिक सौहार्द और कानून के सही इस्तेमाल से जुड़ा है।भीम आर्मी प्रमुख और सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने इस गिरफ़्तारी को ‘चिंताजनक मिसाल’ बताया है।
आख़िर चार साल पुराने विवाद को अब क्यों उछाला गया? क्या ये कोई राजनीतिक साज़िश है? आइए समझते हैं पूरा मामला आसान भाषा में।”
मामला है सिद्धार्थनगर के इटवा थाना क्षेत्र में स्थित ‘अल-फ़ारूक इंटर कॉलेज’ का, जहां मौलाना शब्बीर अहमद सालों से प्रबंधक के रूप में कार्य कर रहे हैं।वो एक जाने-माने शैक्षणिक और धार्मिक व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने हमेशा मजहबी सौहार्द और शिक्षा को बढ़ावा दिया है।
लेकिन अब उनके ऊपर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने एक युवक का जबरन धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश की थी।
ये शिकायत की गई है एक ऐसे व्यक्ति द्वारा, जिसने साल 2020 में कॉलेज में नौकरी के लिए आवेदन किया था, लेकिन चयन नहीं हो पाया।चार साल बाद, उसी व्यक्ति ने अचानक आरोप लगाया कि मौलाना ने धर्म बदलवाने की कोशिश की थी।
अब सवाल ये उठता है कि अगर 2020 में ही ये घटना हुई थी, तो शिकायत तब क्यों नहीं की गई?
क्यों इतने साल बाद ये आरोप उछाला गया? क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक या निजी बदले की भावना है?
इस मामले पर सांसद चंद्रशेखर आज़ाद का बयान सामने आया है।
उन्होंने कहा, “अगर मामला 2020 का है, तो उस वक्त शिकायत क्यों नहीं की गई? क्या ये धार्मिक मामला है या व्यक्तिगत दुश्मनी को मजहबी रंग दिया जा रहा है?” उन्होंने सवाल उठाया कि बिना किसी नए सबूत के अचानक गिरफ़्तारी करना, एक बड़े समुदाय की छवि को धूमिल करने जैसा है।
उन्होंने यूपी सरकार से मांग की है कि मौलाना शब्बीर की गिरफ्तारी पर रोक लगे और इस मामले की निष्पक्ष जांच DIG बस्ती द्वारा करवाई जाए।
इस मामले में यूपी सरकार ने ‘धार्मिक परिवर्तन निषेध अध्यादेश, 2020’ यानी कि एंटी-कन्वर्ज़न लॉ के तहत कार्रवाई की है।
इस कानून के तहत जबरन धर्म परिवर्तन करने पर सख़्त सज़ा का प्रावधान है।
लेकिन इस कानून को लेकर पहले भी कई बार आलोचना हो चुकी है — खासकर जब इसका इस्तेमाल अल्पसंख्यक समुदायों के ख़िलाफ़ किया गया हो।कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि इस कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है, और इसे एक राजनीतिक हथियार बना दिया गया है।
कॉलेज के एक वरिष्ठ शिक्षक राकेश चंद्र श्रीवास्तव ने कहा, “मैं 1997 से यहां पढ़ा रहा हूं। मौलाना साहब ने कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं किया। ये सारे आरोप बेबुनियाद हैं।”
मौहल्ले के कई लोगों ने भी बताया कि कॉलेज हमेशा सामाजिक और मजहबी एकता का उदाहरण रहा है।
चंद्रशेखर आज़ाद ने अपनी बात के अंत में कहा — “हमें अफवाहों से नहीं, संविधान से चलना चाहिए। मौलाना साहब की गिरफ्तारी न केवल गलत है, बल्कि समाज में डर और असमानता को बढ़ावा देती है।”
उन्होंने जनता से अपील की कि वो शांति बनाए रखें और सच्चाई के साथ खड़े हों। तो सवाल ये है — क्या यूपी सरकार इस मामले पर निष्पक्ष जांच कराएगी? क्या राजनीतिक दबाव के चलते कानून का दुरुपयोग हो रहा है? क्या सच्चाई सामने आएगी या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह दबा दिया जाएगा?